इस शहर में
भीड़ है घुटन है अवसाद है इस शहर में
प्यार का ब्यापार है इस शहर में
ऊँची खडी अटांलिकाएं हंस रही हैं
रह गए दिन चार झोपड़ी के इस शहर में
अब कहीं नहीं चाँद दीखता ना कहीं सूरज हमें
रात भी नहीं रात लगती रात को इस शहर में
तप रही हर राह मंजिल फूल में कांटे अधिक हैं
बर्फ़ को पिघलाऊ कैसे भाव बिकते इस शहर में
है कशिश खुदगर्ज बनकर पूछ लेती हूँ तुम्हे
गाँव थे तुम क्यूँ बदलकर आगये इस शहर में
है जुडी दीवार खिड़की आँगन इस शहर में
अजनवी बनकर पता लाचार है इस शहर में
घट रही है उमर खेतों की देखो इन दिनों
कैसे मिटेगी भूख कल की तुम बताओ इस शहर में
धुन्द है धुंधलका भी शोर भी इस शहर में
बीमार मनके जड रहे हैं उन्माद के इस शहर में
अब सुहाता कौन किसको आँखे मुंदी इस शहर में
ढूढने मैं क्या चली थी भूल बैठी इस शहर में
Comments
Post a Comment