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Showing posts from May, 2017

merri jiwan ki anubhuti

                               जीवन एक यथार्थ कभी कभी जीवन इतना सुखद लगता है कि आसमान मुठी में महसूस होता है और कभी जब निराशा मन को घेरती है तो पैरों तले की जमीनभी  दिखाई नहीं देती , ये पल आते और जाते हैं ठहरते नहीं पर अगर हम दोनों  ही परिस्थितियों में नहीं संभले तो गिरने का भय बना ही रहता है ,एक परिस्थिति में उपर से नीचे गिरने का डर और दूसरी स्थिति  में निराशा  से जीवन जाने का भय  जीवन की यही छणभंगुरता  कभी हमें शक्ति देती है तो कभी हताशा . ये हमें तय करना है हम किस दिशा में जाएँ .सामाजिक सम्बन्धओ  से इन हालातों का सामना भली भांति किया जा सकता है .जब निराशा से मन की डोर टूटने लगे तो रिश्तों की गर्माहट से सँभलने  का हौसला भी हासिल हो जाये . और जब आशा के पंखों  से मन आसमान में उड़ता हो तब मन की बेकली को रिशतों  में साझा करना अधिक सुखद हो जाता है .   संभावना  और दुश्चिंता के बीच उहापोह से पराजय के उद्घोष से उपजती है विडंबना नंगी हथेली पर उगाती सर...

Mere sansmaran

Pahad की संवेनदशीलता

अबकी बार रोये हैं पहाड़ बादलों  ने निभाई शत्रुता वर्षा ने तोड़े संस्कार धरती भी रोई  हजार बार अबकी बार रोये हैं पहाड़ सुरलोक सी सुगंध बसती थी जहाँ फ्यूंलड़ी फूल खिलते  थे जहाँ बांज बुरांस भी इठलाता था जहाँ बांसुरी मोच्छन्ग स्वर गुनगुनाता था जहाँ वीरान उदास निराश है पहाड़ अबकी बार रोये हैं पहाड़ यूँ तो जीवन देतें हैं बादल पर जब जीवन ही लील ले बादल गाँव के गाँव खो जाएँ वजूद जीवन की धड़कन ना हो मोजूद ठगा है मानव ठगें हैं पहाड़ अबकी बार रोये हैं पहाड़ स्वप्न सजीले नैनो में उमड़े फिर गुम गए इन्ही नैनो में मूंदे नैनो  में  भी थी अभिलाषा जीने की तड़प मन में आशा छटपटाती  देह , निरीह था पहाड़ अबकी बार रोये हैं पहाड़
इस शहर में भीड़ है घुटन है अवसाद है इस शहर में प्यार का ब्यापार है इस शहर में ऊँची खडी  अटांलिकाएं  हंस रही हैं रह गए दिन चार झोपड़ी के इस शहर में अब कहीं नहीं चाँद दीखता ना कहीं सूरज हमें रात भी नहीं रात लगती रात को इस शहर में तप रही हर राह  मंजिल फूल में कांटे अधिक हैं बर्फ़ को पिघलाऊ कैसे भाव बिकते इस शहर में है कशिश खुदगर्ज बनकर पूछ लेती हूँ तुम्हे गाँव थे तुम क्यूँ बदलकर आगये इस शहर में है जुडी दीवार खिड़की आँगन इस शहर में अजनवी बनकर पता लाचार है इस शहर में घट रही है उमर खेतों की देखो इन दिनों कैसे मिटेगी भूख कल की तुम बताओ इस शहर में धुन्द है धुंधलका भी शोर भी इस शहर में बीमार मनके जड रहे हैं  उन्माद के इस शहर में अब सुहाता कौन किसको आँखे मुंदी इस शहर में ढूढने मैं क्या चली  थी  भूल बैठी इस शहर में  
आज  अचानक एक विचार आया कि हमारी सोच सामाजिक ताने बानो से प्रभावित होती है या हमारे  विचार  सामाजिक चेतना  को प्रभावित करते हैं   फिर  लगा दोनों ही बातें एक दुसरे की पूरक हैं अगर हम इस लायक  हैं या समाज में हमने अपनी पहचान बनाइ है और हमें लगे कि  समाज हमें सुनना चाहता है तो अवश्य ही हम समाज में सामाजिक चेतना प्रदान करने  में अपनी भूमिका तय कर सकते हैं  और यदि हम अपनी योग्यता क्षमता को पहचाने में असफल हैं तो समाज के सामाजिक सरोकारों में अपने  को तलाशते हुए विचारों से प्रभावित होना स्वाभाविक हो जाता है इसी तरह दोनों  बातें एक दूसरे की पूरक हो जाती हैं पुस्तक हमारी सहचरी हैं एक ओर ये हमको ज्ञान देती हैं दूसरी तरफ उदेश्य तक जाने का मार्ग भी सुझाती हैं मैंने भी इस मर्म को जानने की कोशिश की पर हर बार बार बार  व्यवधान हुआ और पुस्तक के पृष्ट खुले फडफडाते मुझे चिड़ाते  से लगे मेरे पास धैर्य नहीं था मैंने पुस्तक बंद कर दी और बेकार की बातों में अपने आप को उलझा दिया आज जब व्यवधान नहीं  है तो पुस्तकों से पहुंच कठिन हो गई ...