Mere Sansmaran
हिम शिखरों को जलते देखा ज्वालाओं को पिघलते देखा ,अपनी विवशता पर सागर को जारजार रोते हुए देखा आंगन आंगन धूप खिली हो हँसता चौक चौबारा हो ,तितली भवरों की गुंजन से सरसे मौसम सारा हो अभिलषा की उड़ती पतंगों पतंगों को अम्बर में कटते देखा बस इसी तरह तरह का अहसास हो ता है कभी कभी आदमी क्यों दौड़ रहा जीवन एक मृग तृष्णा है जितना इसके पीछे दौड़ो उतना ही हाथ से फिसल जाती है आज एक विचार बार बार मन में आ रहा है ,किमैंने आज तक क्योँ