आज  अचानक एक विचार आया कि हमारी सोच सामाजिक ताने बानो से प्रभावित होती है या हमारे  विचार  सामाजिक चेतना  को प्रभावित करते हैं   फिर  लगा दोनों ही बातें एक दुसरे की पूरक हैं अगर हम इस लायक  हैं या समाज में हमने अपनी पहचान बनाइ है और हमें लगे कि  समाज हमें सुनना चाहता है तो अवश्य ही हम समाज में सामाजिक चेतना प्रदान करने  में अपनी भूमिका तय कर सकते हैं  और यदि हम अपनी योग्यता क्षमता को पहचाने में असफल हैं तो समाज के सामाजिक सरोकारों में अपने  को तलाशते हुए विचारों से प्रभावित होना स्वाभाविक हो जाता है इसी तरह दोनों  बातें एक दूसरे की पूरक हो जाती हैं पुस्तक हमारी सहचरी हैं एक ओर ये हमको ज्ञान देती हैं दूसरी तरफ उदेश्य तक जाने का मार्ग भी सुझाती हैं मैंने भी इस मर्म को जानने की कोशिश की पर हर बार बार बार  व्यवधान हुआ और पुस्तक के पृष्ट खुले फडफडाते मुझे चिड़ाते  से लगे मेरे पास धैर्य नहीं था मैंने पुस्तक बंद कर दी और बेकार की बातों में अपने आप को उलझा दिया आज जब व्यवधान नहीं  है तो पुस्तकों से पहुंच कठिन हो गई  आँखें धुंधला रही हैं शब्द अपने अर्थ खो रहे हैं और मेरे मन में अनेक सवाल हैं साथ में जवाब भी पर क्या आज सवाल सुनने वाले व् जवाब ढूडने वाले सामाजिक सरोकारों से जुड़ पा रहे हैं या आज की भौतिक चकाचौंध ने हम सब के मन को(  सुख सुविधा ने ) इस तरह से जकड लिया है की हम अपने चारों ओर ख़ुशी व् सुख इन्ही संसाधनों में  देख रहे हैं वैचारिक धरातल सूख रहा है आदर्श नेपथ्य में दम तोड़ रहा है और हमें लगता है हमने प्रगति कर ली है

पानी  पर चल कर  निशा छोड़े नहीं जाते
निशान के लिए एक अदद धरातल चाहिए
यूँ तो जिंदगी जीने को  जी लेते हैं सभी
एक मुस्कराती जिन्दगी को नया पैगाम चाहिए

  

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