14/05/2020 dwand

एक तरफ संस्कार हैं और दूसरी तरफ यथार्थ .दोनों में द्वन्द है संस्कार सत्य की और खींचता है और यथार्थ समय के अनुसार जो भी है जैसा भी है उसे पाने की इच्छा का प्रबल आकर्षण. सच कहें संस्कार कहीं पीछे छूटते  जा रहे हैं  और  मायावी दुनिया का विकृत रूप चेतना पर हावी होता जा रहा है . आज सम्पूर्ण विश्व भयावह  महामारी के गिरफ्त में है और उससे निकलने का कोई उपाय भी नहीं दिखाई दे रहा है. ऐसा प्रतीत हो रहा है की मानव निराशा में आशा ढूढ रहा है  जो उसे मिल भी जाएगी अगर उसने हिम्मत नहीं हरी  तो -

चलते - चलते पांव जले हैं , भीतर सारे घाव खुले हैं
यक्ष प्रश्न  पुछता समय से वाणी में क्योँ जहर घुले हैं

संस्कारों की लेकर गठरी , उन्मादों से जूझ रही है
सरपट दौड़ रही जो सड़कें , कोलाहल से मौन पड़ी हैं
अवसादों के झंझावत से सपने धूमिल ध्वस्त पड़े हैं
कालचक्र  की बिछी बिसातें , दग्ध ह्रदय में शूल गडे हैं
छाती पर अंगार पड़े हैं छाले बेशुमार पड़े हैं
यक्ष प्रश्न  पुछता समय से वाणी में क्योँ जहर घुले हैं

सप्त अश्व में बैठ यति , चिर यात्रा में लीन  रहा
मंत्री सेवक चाकर से वह विज्ञ रहा अनभिज्ञ  रहा
तभी तो ऋतुओं ने भी सब तोड़ दिए प्रतिबन्ध
कभी तपाई देह धरा की कभी बरसे निर्द्वंद
प्रश्नों से संवाद जुड़ें हैं , अंतर्मन से वाद जुड़े हैं
यक्ष प्रश्न  पुछता समय से वाणी में क्योँ जहर घुले हैं




Comments

Popular posts from this blog

gajal ki ek sham